Durga Saptashati Path Vidhi: श्री दुर्गा सप्तशती सम्पूर्ण पाठ विधि

'ज्योतिर्विद डी डी शास्त्री'

Durga Saptashati Path Vidhi: श्री दुर्गा सप्तशती सम्पूर्ण पाठ विधि
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या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

Durga Saptashati Path Vidhi: जय माता दी……..देवी भागवत में कहा गया है कि जिस तरह से ”वेद” अनादि है,उसी प्रकार ”सप्तशती” भी अनादि है,श्री व्यास जी द्वारा रचित महापुराणों में ”मार्कण्डेय पुराण” के माध्यम से मानव मात्र के कल्याण के लिए इसकी रचना की गई है,जिस प्रकार योग का सर्वोत्तम ग्रंथ गीता है उसी प्रकार ”दुर्गा सप्तशती” शक्ति उपासना का श्रेष्ठ ग्रंथ है.!

‘Durga Saptashati Path Vidhi: दुर्गा सप्तशती’ के सात सौ श्लोकों को तीन भागों प्रथम चरित्र {महाकाली}, मध्यम चरित्र {महालक्ष्मी} तथा उत्तम चरित्र {महा सरस्वती} में विभाजित किया गया है,प्रत्येक चरित्र में सात-सात देवियों का स्तोत्र में उल्लेख मिलता है प्रथम चरित्र में काली,तारा,छिन्नमस्ता,सुमुखी,भुवनेश्वरी,बाला,कुब्जा,द्वितीय चरित्र में लक्ष्मी,ललिता,काली,दुर्गा,गायत्री,अरुन्धती,सरस्वती तथा तृतीय चरित्र में ब्राह्मी,माहेश्वरी,कौमारी,वैष्णवी, वाराही,नारसिंही तथा चामुंडा {शिवा} इस प्रकार कुल 21 देवियों के महात्म्य व प्रयोग इन तीन चरित्रों में दिए गये हैं.नन्दा,शाकम्भरी,भीमा ये तीन सप्तशती पाठ की महाशक्तियां तथा दुर्गा,रक्तदन्तिका व भ्रामरी को सप्तशती स्तोत्र का बीज कहा गया है,तंत्र में शक्ति के तीन रूप प्रतिमा,यंत्र तथा बीजाक्षर माने गए हैं.शक्ति की साधना हेतु इन तीनों रूपों का पद्धति अनुसार समन्वय आवश्यक माना जाता है.I

सप्तशती के सात सौ श्लोकों को तेरह अध्यायों में बांटा गया है प्रथम चरित्र में केवल पहला अध्याय, मध्यम चरित्र में दूसरा,तीसरा व चौथा अध्याय तथा शेष सभी अध्याय उत्तम चरित्र में रखे गये हैं.प्रथम चरित्र में महाकाली का बीजाक्षर रूप ऊँ ‘एं है.मध्यम चरित्र {महालक्ष्मी} का बीजाक्षर रूप ‘हृी’ तथा तीसरे उत्तम चरित्र महासरस्वती का बीजाक्षर रूप ‘क्लीं’ है.अन्य तांत्रिक साधनाओं में ‘ऐं’ मंत्र सरस्वती का, ‘हृीं’ महालक्ष्मी का तथा ‘क्लीं’ महाकाली बीज है.तीनों बीजाक्षर ऐं ह्रीं क्लीं किसी भी तंत्र साधना हेतु आवश्यक तथा आधार माने गये हैं.तंत्र मुखयतः वेदों से लिया गया है ऋग्वेद से शाक्त तंत्र,यजुर्वेद से शैव तंत्र तथा सामवेद से वैष्णव तंत्र का अविर्भाव हुआ है यह तीनों वेद तीनों महाशक्तियों के स्वरूप हैं तथा यह तीनों तंत्र देवियों के तीनों स्वरूप की अभिव्यक्ति हैं.।

Durga Saptashati Path Vidhi: ‘दुर्गा सप्तशती’ के सात सौ श्लोकों का प्रयोग विवरण इस प्रकार से है.।

प्रयोगाणां तु नवति मारणे मोहनेऽत्र तु।
उच्चाटे सतम्भने वापि प्रयोगाणां शतद्वयम्॥
मध्यमेऽश चरित्रे स्यातृतीयेऽथ चरित्र के।
विद्धेषवश्ययोश्चात्र प्रयोगरिकृते मताः॥
एवं सप्तशत चात्र प्रयोगाः संप्त- कीर्तिताः॥
तत्मात्सप्तशतीत्मेव प्रोकं व्यासेन धीमता॥

अर्थात इस सप्तशती में मारण के नब्बे,मोहन के नब्बे,उच्चाटन के दो सौ,स्तंभन के दो सौ तथा वशीकरण और विद्वेषण के साठ प्रयोग दिए गये हैं,इस प्रकार यह कुल 700 श्लोक 700 प्रयोगों के समान माने गये हैं.।

Durga Saptashati Path Vidhi: दुर्गा सप्तशती पाठ विधि

-:’सामान्य विधि’:-
नवार्ण मंत्र जप और सप्तशती न्यास के बाद तेरह अध्यायों का क्रमशः पाठ,प्राचीन काल में कीलक, कवच और अर्गला का पाठ भी सप्तशती के मूल मंत्रों के साथ ही किया जाता रहा है,आज इसमें अथर्वशीर्ष, कुंजिका मंत्र, वेदोक्त रात्रि देवी सूक्त आदि का पाठ भी समाहित है जिससे साधक एक घंटे में देवी पाठ करते हैं….!

Durga Saptashati Path Vidhi: वाकार विधि

यह विधि अत्यंत सरल मानी गयी है,इस विधि में प्रथम दिन एक पाठ प्रथम अध्याय,दूसरे दिन दो पाठ द्वितीय,तृतीय अध्याय,तीसरे दिन एक पाठ चतुर्थ अध्याय,चौथे दिन चार पाठ पंचम,षष्ठ, सप्तम व अष्टम अध्याय, पांचवें दिन दो अध्यायों का पाठ नवम, दशम अध्याय, छठे दिन ग्यारहवां अध्याय, सातवें दिन दो पाठ द्वादश एवं त्रयोदश अध्याय करके एक आवृति सप्तशती की होती है.!

Durga Saptashati Path Vidhi: संपुट पाठ विधि

किसी विशेष प्रयोजन हेतु विशेष मंत्र से एक बार ऊपर तथा एक नीचे बांधना उदाहरण हेतु संपुट मंत्र मूलमंत्र-1, संपुट मंत्र फिर मूलमंत्र अंत में पुनः संपुट मंत्र आदि इस विधि में समय अधिक लगता है.!

Durga Saptashati Path Vidhi: सार्ध नवचण्डी विधि

इस विधि में नौ ब्राह्मण साधारण विधि द्वारा पाठ करते हैं,एक ब्राह्मण सप्तशती का आधा पाठ करता है,(जिसका अर्थ है- एक से चार अध्याय का संपूर्ण पाठ,पांचवे अध्याय में ”देवा उचुः- नमो देव्ये महादेव्यै” से आरंभ कर ऋषिरुवाच तक, एकादश अध्याय का नारायण स्तुति, बारहवां तथा तेरहवां अध्याय संपूर्ण) इस आधे पाठ को करने से ही संपूर्ण कार्य की पूर्णता मानी जाती है,एक अन्य ब्राह्मण द्वारा षडंग रुद्राष्टाध्यायी का पाठ किया जाता है.इस प्रकार कुल ग्यारह ब्राह्मणों द्वारा नवचण्डी विधि द्वारा सप्तशती का पाठ होता है,पाठ पश्चात् उत्तरांग करके अग्नि स्थापना कर पूर्णाहुति देते हुए हवन किया जाता है जिसमें नवग्रह समिधाओं से ग्रहयोग, सप्तशती के पूर्ण मंत्र, श्री सूक्त वाहन तथा शिवमंत्र ‘सद्सूक्त का प्रयोग होता है जिसके बाद ब्राह्मण भोजन,’ कुमारी का भोजन आदि किया जाता है.वाराही तंत्र में कहा गया है कि जो ”सार्धनवचण्डी” प्रयोग को संपन्न करता है वह प्राणमुक्त होने तक भयमुक्त रहता है,राज्य, श्री व संपत्ति प्राप्त करता है……!

Durga Saptashati Path Vidhi: शतचण्डी विधि

मां की प्रसन्नता हेतु किसी भी दुर्गा मंदिर के समीप सुंदर मण्डप व हवन कुंड स्थापित करके {पश्चिम या मध्य भाग में} दस उत्तम ब्राह्मणों {योग्य} को बुलाकर उन सभी के द्वारा पृथक-पृथक मार्कण्डेय पुराणोक्त श्री दुर्गा सप्तशती का दस बार पाठ करवाएं.इसके अलावा प्रत्येक ब्राह्मण से एक-एक हजार नवार्ण मंत्र भी करवाने चाहिए.शक्ति संप्रदाय वाले शतचण्डी (108) पाठ विधि हेतु अष्टमी,नवमी, चतुर्दशी तथा पूर्णिमा का दिन शुभ मानते हैं.इस अनुष्ठान विधि में नौ कुमारियों का पूजन करना चाहिए जो दो से दस वर्ष तक की होनी चाहिए तथा इन कन्याओं को क्रमशः कुमारी,त्रिमूर्ति,कल्याणी,रोहिणी,कालिका,शाम्भवी,दुर्गा,चंडिका तथा मुद्रा नाम मंत्रों से पूजना चाहिए.इस कन्या पूजन में संपूर्ण मनोरथ सिद्धि हेतु ब्राह्मण कन्या,यश हेतु क्षत्रिय कन्या,धन के लिए वेश्य तथा पुत्र प्राप्ति हेतु शूद्र कन्या का पूजन करें.इन सभी कन्याओं का आवाहन प्रत्येक देवी का नाम लेकर यथा ”मैं मंत्राक्षरमयी लक्ष्मीरुपिणी, मातृरुपधारिणी तथा साक्षात् नव दुर्गा स्वरूपिणी कन्याओं का आवाहन करता हूं तथा प्रत्येक देवी को नमस्कार करता हूं,” इस प्रकार से प्रार्थना करनी चाहिए.वेदी पर सर्वतोभद्र मण्डल बनाकर कलश स्थापना कर पूजन करें.शतचण्डी विधि अनुष्ठान में यंत्रस्थ कलश, श्री गणेश,नवग्रह,मातृका,वास्तु,सप्तऋषी,सप्तचिरंजीव,64 योगिनी50 क्षेत्रपाल तथा अन्याय देवताओं का वैदिक पूजन होता है.जिसके पश्चात् चार दिनों तक पूजा सहित पाठ करना चाहिए.पांचवें दिन हवन होता है.!
इन सब विधियों {अनुष्ठानों} के अतिरिक्त प्रतिलोम विधि,कृष्ण विधि,चतुर्दशीविधि,अष्टमी विधि,सहस्त्रचण्डी विधि {1008} पाठ,ददाति विधि,प्रतिगृहणाति विधि आदि अत्यंत गोपनीय विधियां भी हैं जिनसे साधक इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति कर सकता है.!

Durga Saptashati Path Vidhi: श्री दुर्गासप्तशती अनुष्ठान विधि

श्री दुर्गासप्तशती महायज्ञ/अनुष्ठान विधि,भगवती मां दुर्गाजी की प्रसन्नता के लिए जो अनुष्ठान किये जाते हैं उनमें दुर्गा सप्तशती का अनुष्ठान विशेष कल्याणकारी माना गया है.इस अनुष्ठान को ही शक्ति साधना भी कहा जाता है.शक्ति मानव के दैनन्दिन व्यावहारिक जीवन की आपदाओं का निवारण कर ज्ञान,बल, क्रिया शक्ति आदि प्रदान कर उसकी धर्म-अर्थ काममूलक इच्छाओं को पूर्ण करती है एवं अंत में आलौकिक परमानंद का अधिकारी बनाकर उसे मोक्ष प्रदान करती है.दुर्गा सप्तशती एक तांत्रिक पुस्तक होने का गौरव भी प्राप्त करती है.भगवती शक्ति एक होकर भी लोक कल्याण के लिए अनेक रूपों को धारण करती है.श्वेतांबर उपनिषद के अनुसार यही आद्या शक्ति त्रिशक्ति अर्थात महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती के रूप में प्रकट होती है.इस प्रकार पराशक्ति त्रिशक्ति,नवदुर्गा,दश महाविद्या और ऐसे ही अनंत नामों से परम पूज्य है,श्री दुर्गा सप्तशती नारायणावतार श्री व्यासजी द्वारा रचित महा पुराणों में मार्कण्डेयपुराण से ली गयी है.इसम सात सौ पद्यों का समावेश होने के कारण इसे सप्तशती का नाम दिया गया है.तंत्र शास्त्रों में इसका सर्वाधिक महत्व प्रतिपादित है और तांत्रिक प्रक्रियाओं का इसके पाठ में बहुधा उपयोग होता आया है.पूरे दुर्गा सप्तशती में 360 शक्तियों का वर्णन है.इस पुस्तक में तेरह अध्याय हैं.शास्त्रों के अनुसार शक्ति पूजन के साथ भैरव पूजन भी अनिवार्य माना गया है.अतः अष्टोत्तरशतनाम रूप बटुक भैरव की नामावली का पाठ भी दुर्गासप्तशती के अंगों में जोड़ दिया जाता है.इसका प्रयोग तीन प्रकार से होता है.!

01. नवार्ण मंत्र के जप से पहले भैरवो भूतनाथश्च से प्रभविष्णुरितीवरितक या नमोऽत्त नामबली या भैरवजी के मूल मंत्र का 108 बार जप.!
02. प्रत्येक चरित्र के आद्यान्त में 1-1 पाठ.!
03. प्रत्येक उवाचमंत्र के आस-पास संपुट देकर पाठ.नैवेद्य का प्रयोग अपनी कामनापूर्ति हेतु दैनिक पूजा में नित्य किया जा सकता है.यदि मां दुर्गाजी की प्रतिमा कांसे की हो तो विशेष फलदायिनी होती है.!

Durga Saptashati Path Vidhi: श्री दुर्गासप्तशती का अनुष्ठान इस तरह करें

01. कलश स्थापना
02. गौरी गणेश पूजन
03.कलश पूजन
04. षोडश मातृकाओं का पूजन
05.पितृ पूजन
06. नवग्रह पूजन
07. भगवती आध्यशक्ति माँ दुर्गा पूजन

-:माँ भगवती का पूजन निम्न विधि से करें:-
आवाहन : आवाहनार्थे पुष्पांजली सर्मपयामि..!
आसन : आसनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि….!
पाद : पाद्यर्यो : पाद्य समर्पयामि…!
अर्घ्य : हस्तयो : अर्घ्य स्नानः…!
आचमन : आचमन समर्पयामि….!
स्नान : स्नानादि जलं समर्पयामि…!
स्नानांग : आचमन : स्नानन्ते पुनराचमनीयं जलं समर्पयामि…!
दुधि स्नान : दुग्ध स्नान समर्पयामि…!
दहि स्नान : दधि स्नानं समर्पयामि…!
घृत स्नान : घृतस्नानं समर्पयामि…!
शहद स्नान : मधु स्नानं सर्मपयामि…!
शर्करा स्नान : शर्करा स्नानं समर्पयामि….!
पंचामृत स्नान : पंचामृत स्नानं समर्पयामि…!
गन्धोदक स्नान : गन्धोदक स्नानं समर्पयामि …!
शुद्धोदक स्नान : शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि…!
वस्त्र : वस्त्रं समर्पयामि…!
उपवस्त्र : उपवस्त्रं समर्पयामि…!
तिलक : तिलकं समर्पयामि…!
अक्षत : अक्षतं समर्पयामि…!
श्रृंगार : श्रृंगारम समर्पयामि…!
धुप : धूपं समर्पयामि…!
दीपकं : दीपकं आघ्रपयामि…!
नैवेध्यम : नैवेध्यम निवेदयामि ..!
ऋतू फलम : ऋतू फलम समर्पयामि…!
ऐला लवंग सहित ताम्बूल पत्र : ऐला लवंग सहित ताम्बूल पत्र समर्पयामि….!
द्रब्य दक्षिणा : द्रब्य दक्षिणाम समर्पयामि….!
विशेष अर्घ्यम : विशेष अर्घ्यम समर्पयामि…!
आरती : कर्पूर नीराजनं आरारतीर समर्पयामि…!
क्षमा प्रार्थना : क्षमा प्रार्थनाम समर्पयामि ….!
प्रदिक्षीणा : प्रदक्षिणाम पदे पदे…….!
ॐ शकराय नमः ….!!!

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