Gopashtami : गोपाष्टमी पर्व

'ज्योतिर्विद डी डी शास्त्री'

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सुरूपा बहुरूपाश्च विश्वरूपाश्च मातरः।
गावो मामुपतिष्ठन्तामिति नित्यं प्रकीर्तयेत्॥

ॐ सर्वदेव वासिनी नमः….20 नवम्बर 2023, के दिन गौपाष्टमी का उत्सव मनाया जाएगा. इस दिन प्रात: काल में गौओं को स्नान आदि कराया जाता है तथा इस दिन बछडे़ सहित गाय की पूजा करने का विधान है. प्रात:काल में ही धूप-दीप, गंध, पुष्प, अक्षत, रोली, गुड़, जलेबी, वस्त्र तथा जल से गाय का पूजन किया जाता है और आरती उतारी जाती है. इस दिन कई व्यक्ति ग्वालों को भी उपहार आदि देकर उनका भी पूजन करते हैं.!
गोपाष्टमी के शुभ अवसर पर गौशाला में गोसंवर्धन हेतु गौ पूजन का आयोजन किया जाता है. गौमाता पूजन कार्यक्रम में सभी लोग परिवार सहित उपस्थित होकर पूजा अर्चना करते हैं. गोपाष्टमी की पूजा विधि पूर्वक विध्दान पंडितों द्वारा संपन्न की जाती है. बाद में सभी प्रसाद वितरण किया जाता है. सभी लोग गौ माता का पूजन कर उसके वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक महत्व को समझ गौ रक्षा व गौ संवर्धन का संकल्प करते हैं.!
शास्त्रों में गोपाष्टमी पर्व पर गायों की विशेष पूजा करने का विधान निर्मित किया गया है. इसलिए कार्तिक माह की शुक्लपक्ष कि अष्टमी तिथि को प्रात:काल गौओं को स्नान कराकर उन्हें सुसज्जित करके गन्ध पुष्पादि से उनका पूजन करना चाहिए. इसके पश्चात यदि संभव हो तो गायों के साथ कुछ दूर तक चलना चाहिए कहते हैं ऎसा करने से प्रगत्ति के मार्ग प्रशस्त होते हैं. गायों को भोजन कराना चाहिए तथा उनकी चरण को मस्तक पर लगाना चाहिए. ऐसा करने से सौभाग्य की वृध्दि होती है.!

-:गोपाष्टमी पूजन विधि:-
इस दिन बछड़े सहित गाय का पूजन करने का विधान है,इस दिन प्रातः काल उठ कर नित्य कर्म से निवृत हो कर स्नान करते है, प्रातः काल ही गौओं और उनके बछड़ों को भी स्नान कराया जाता है, गौ माता के अंगों में मेहंदी, रोली हल्दी आदि के थापे लगाए जाते हैं, गायों को सजाया जाता है, प्रातः काल ही धूप, दीप, पुष्प, अक्षत, रोली, गुड, जलेबी, वस्त्र और जल से गौ माता की पूजा की जाती है और आरती उतरी जाती है. पूजन के बाद गौ ग्रास निकाला जाता है, गौ माता की परिक्रमा की जाती है, परिक्रमा के बाद गौओं के साथ कुछ दूर तक चला जाता है.!

-:गोपाष्टमी पौराणिक कथा:-
एक पौराणिक कथा अनुसार बालक कृष्ण ने माँ यशोदा से गायों की सेवा करनी की इच्छा व्यक्त की कृष्ण कहते हैं कि माँ मुझे गाय चराने की अनुमति मिलनी चाहिए उनके कहने पर शांडिल्य ऋषि द्वारा अच्छा समय देखकर उन्हें भी गाय चराने ले जाने दिया जो समय निकाला गया वह गोपाष्टमी का शुभ दिन था बलक कृष्ण ने गायों की पूजा करते हैं, प्रदक्षिणा करते हुए साष्टांग प्रणाम करते हैं.!
गोपाष्टमी के अवसर पर गऊशालाओं व गाय पालकों के यहां जाकर गायों की पूजा अर्चना कि जाती है इसके लिए दीपक, गुड़, केला, लडडू, फूल माला, गंगाजल इत्यादि वस्तुओं से इनकी पूजा की जाती है. महिलाएं गऊओं से पहले श्री कृष्ण की पूजा कर गऊओं को तिलक लगाती हैं. गायों को हरा चारा, गुड़ इत्यादि खिलाया जाता है तथा सुख-समृद्धि की कामना कि जाती है.!

-:गोपाष्टमी पर कृष्ण पूजन:-
गोपाष्टमी पर गऊओं की पूजा भगवान श्री कृष्ण को बेहद प्रिय है तथा इनमें सभी देवताओं का वास माना जाता है. कईं स्थानों पर गोपाष्टमी के अवसर पर गायों की उपस्थिति में प्रभातफेरी सत्संग संपन्न होते हैं. गोपाष्टमी पर्व के उपलक्ष्य में जगह-जगह अन्नकूट भंडारे का आयोजन किया जाता है. भंडारे में श्रद्धालुओं ने अन्नकूट का प्रसाद ग्रहण करते हैं. वहीं गोपाष्टमी पर्व की पूर्व संध्या पर शहर के कई मंदिरों में सत्संग-भजन का आयोजन भी किया जाता है. मंदिर में गोपाष्टमी के उपलक्ष्य में रात्रि कीर्तन में श्रद्धालुओं ने भक्ति रचनाओं का रसपान करते हैं. इस मौके पर प्रवचन एवं भजन संध्या में उपस्थित श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है.गो सेवा से जीवन धन्य हो जाता है तथा मनुष्य सदैव सुखी रहता है.!

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-:’गोपाष्टमी पूजन मंत्र’:-

लक्ष्मीर्या लोकपालानां धेनुरूपेण संस्थिता।
घृतं वहति यज्ञार्थ मम पापं व्यपोहतु।।
घृतक्षीरप्रदा गावो घृतयोन्यो घृतोद्भवाः।
घृतनद्यो घृतावर्तास्ता मे सन्तु सदा गृहे॥
घृतं मे हृदये नित्यं घृतं नाभ्यां प्रतिष्ठितम्।
घृतं सर्वेषु गात्रेषु घृतं मे मनसि स्थितम्॥
गावो ममाग्रतो नित्यं गावः पृष्ठत एव च।
गावो मे सर्वतश्चैव गवां मध्ये वसाम्यहम्॥
सुरूपा बहुरूपाश्च विश्वरूपाश्च मातरः।
गावो मामुपतिष्ठन्तामिति नित्यं प्रकीर्तयेत्॥
-:’श्री गौ अष्टोत्तर नामावलि {गौ माता के 108 नाम}’:-
ॐ कपिला नमः ।
ॐ गौतमी नमः ।
ॐ सुरभी नमः ।
ॐ गौमती नमः ।
ॐ नंदनी नमः ।
ॐ श्यामा नमः ।
ॐ वैष्णवी नमः ।
ॐ मंगला नमः ।
ॐ सर्वदेव वासिनी नमः ।
ॐ महादेवी नमः ॥10॥
ॐ सिंधु अवतरणी नमः ।
ॐ सरस्वती नमः ।
ॐ त्रिवेणी नमः ।
ॐ लक्ष्मी नमः ।
ॐ गौरी नमः ।
ॐ वैदेही नमः ।
ॐ अन्नपूर्णा नमः ।
ॐ कौशल्या नमः ।
ॐ देवकी नमः ।
ॐ गोपालिनी नमः ॥20॥
ॐ कामधेनु नमः ।
ॐ आदिति नमः ।
ॐ माहेश्वरी नमः ।
ॐ गोदावरी नमः ।
ॐ जगदम्बा नमः ।
ॐ वैजयंती नमः ।
ॐ रेवती नमः ।
ॐ सती नमः ।
ॐ भारती नमः ।
ॐ त्रिविद्या नमः ॥30॥
ॐ गंगा नमः ।
ॐ यमुना नमः ।
ॐ कृष्णा नमः ।
ॐ राधा नमः ।
ॐ मोक्षदा नमः ।
ॐ उतरा नमः ।
ॐ अवधा नमः ।
ॐ ब्रजेश्वरी नमः ।
ॐ गोपेश्वरी नमः ।
ॐ कल्याणी नमः ॥40॥
ॐ करुणा नमः ।
ॐ विजया नमः ।
ॐ ज्ञानेश्वरी नमः ।
ॐ कालिंदी नमः ।
ॐ प्रकृति नमः ।
ॐ अरुंधति नमः ।
ॐ वृंदा नमः ।
ॐ गिरिजा नमः ।
ॐ मनहोरणी नमः ।
ॐ संध्या नमः ॥50॥
ॐ ललिता नमः ।
ॐ रश्मि नमः ।
ॐ ज्वाला नमः ।
ॐ तुलसी नमः ।
ॐ मल्लिका नमः ।
ॐ कमला नमः ।
ॐ योगेश्वरी नमः ।
ॐ नारायणी नमः ।
ॐ शिवा नमः ।
ॐ गीता नमः ॥60॥
ॐ नवनीता नमः ।
ॐ अमृता अमरो नमः ।
ॐ स्वाहा नमः ।
ॐ धंनजया नमः ।
ॐ ओमकारेश्वरी नमः ।
ॐ सिद्धिश्वरी नमः ।
ॐ निधि नमः ।
ॐ ऋद्धिश्वरी नमः ।
ॐ रोहिणी नमः ।
ॐ दुर्गा नमः ॥70॥
ॐ दूर्वा नमः ।
ॐ शुभमा नमः ।
ॐ रमा नमः ।
ॐ मोहनेश्वरी नमः ।
ॐ पवित्रा नमः ।
ॐ शताक्षी नमः ।
ॐ परिक्रमा नमः ।
ॐ पितरेश्वरी नमः ।
ॐ हरसिद्धि नमः ।
ॐ मणि नमः ॥80॥
ॐ अंजना नमः ।
ॐ धरणी नमः ।
ॐ विंध्या नमः ।
ॐ नवधा नमः ।
ॐ वारुणी नमः ।
ॐ सुवर्णा नमः ।
ॐ रजता नमः ।
ॐ यशस्वनि नमः ।
ॐ देवेश्वरी नमः ।
ॐ ऋषभा नमः ॥90॥
ॐ पावनी नमः ।
ॐ सुप्रभा नमः ।
ॐ वागेश्वरी नमः ।
ॐ मनसा नमः ।
ॐ शाण्डिली नमः ।
ॐ वेणी नमः ।
ॐ गरुडा नमः ।
ॐ त्रिकुटा नमः ।
ॐ औषधा नमः ।
ॐ कालांगि नमः ॥100॥
ॐ शीतला नमः ।
ॐ गायत्री नमः ।
ॐ कश्यपा नमः ।
ॐ कृतिका नमः ।
ॐ पूर्णा नमः ।
ॐ तृप्ता नमः ।
ॐ भक्ति नमः ।
ॐ त्वरिता नमः ॥108॥

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