आमलकी एकादशी

'ज्योतिर्विद डी डी शास्त्री'

Amalaki Ekadashi
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Amalaki Ekadashi: नमो नारायण…. फाल्गुन माह के शुक्लपक्ष में पुष्य नक्षत्र पर आने वाली एकादशी को आमलकी एकादशी के नाम से जाना जाता है,विष्णु पुराण के अनुसार एक बार भगवान विष्णु के मुख से चन्दमा के समान प्रकाशिए बिन्दू प्रकट होकर पृथ्वी पर गिरा.उसी बिन्दू से आमलक अर्थात आंवले के महान पेड की उत्पति हुई.भगवान विष्णु के मुख से प्रकट होने वाले आंवले के वृक्ष को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है.इस फल के महत्व के विषय में कहा गया है, कि इस फल के स्मरणमात्र से रोग एवं ताप का नाश होता है तथा शुभ फलों की प्राप्ति होती है.यह फल भगवान विष्णु जी को अत्यधिक प्रिय है. इस फल को खाने से तीन गुना शुभ फलों की प्राप्ति होती है.!

Amalaki Ekadashi-:’आमलकी एकादशी शुभ मुहूर्त’:-

आमलकी एकादशी का व्रत फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि के दिन रखा जाता है.बृहस्पतिवार 02 मार्च, गुरुवार 2023 को प्रातः 06 बजकर 40 मिनट से एकादशी तिथि आरम्भ होगी तथा शुक्रवार 03 मार्च शुक्रवार 2023 को पूर्वाह्न 09 बजकर 12 मिनट पर समाप्त होगी,उदयातिथि के अनुसार आमलकी एकादशी का व्रत शुक्रवार 3 मार्च सन 2023 को रखना शास्त्र सम्मत होगा.!

आमलकी एकादशी पूजन हेतु शुभ मुहूर्त शुक्रवार 03 मार्च सन 2023 को प्रातः 06 बजकर 51 से 09 बजकर 11 मिनट तक सर्वोत्तम समय रहेगा तथापि मध्यहन 12 बजकर 47 मिनट तक भगवान विष्णु की पूजा अर्चना हेतु उत्तम समय रहेगा है.व्रत पारण शनिवार 04 मार्च को प्रातः 06 बजकर 51 मिनट से 09 बजकर 01 मिनट के मध्य किया जा सकता है.!

Amalaki Ekadashi: -:आंवला एकादशी पूजा:-

आंवला एकादशी अर्थात आमलकी एकादशी इसी नाम से जाना जाता है यह एकादशी व्रत. फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी को किया जाने वाला यह व्रत व्यक्ति को रोगों से मुक्ति दिलाने वाला होता है. इस व्रत में आंवले के वृक्ष की पूजा करने का विधि-विधान है. आंवला एकादशी का व्रत 6 मार्च 2020 को रखा जाना है.!
इस व्रत के विषय में कहा जाता है, कि यह एकादशी समस्त पापों का नाश करने वाली है. इस व्रत में आंवले के पेड का पूजन किया जाता है. आंवले के वृक्ष के विषय में यह मत है, कि इसकी उत्पति भगवान श्री विष्णु के मुख से हुई है.!

Amalaki Ekadashi: -:आमलकी एकादशी पूजा विधि:-

– आमलकी एकादशी से एक दिन पहले यानी कि दशमी को रात के समय भगवान विष्‍णु का ध्‍यान करते हुए सोना चाहिए.!
– एकादशी के दिन सबसे पहले नित्‍य कर्म से निवृत्त होकर स्‍नान करें और स्‍वच्‍छ वस्‍त्र धारण करें.!
– घर के मंदिर में विष्‍णु की प्रतिमा के सामने हाथ में तिल, कुश, मुद्रा और जल लेकर व्रत का संकल्‍प करें.!
– संकल्‍प लेते हुए इस प्रकार कहें, “मैं भगवान विष्णु की प्रसन्नता एवं मोक्ष की कामना से आमलकी एकादशी का व्रत रखता/रखती हूं.मेरा यह व्रत सफलतापूर्वक पूरा हो इसके लिए श्री हरि मुझे अपनी शरण में रखें.”!
– पञ्चोपचार या षोडशोपचार विधि से श्री हरि विष्‍णु की पूज करें.!
– सबसे पहले विष्‍णु की प्रतिमा को स्‍नान कराएं और पोंछकर स्‍वच्‍छ वस्‍त्र पहनाएं.!
– विष्‍णु को पुष्‍प, ऋतु फल और तुलसी दल अर्पण करें.!
– इसके बाद श्री हरि विष्‍णु की आरती उतारें और उन्‍हें प्रणाम करें.!
– विष्‍णु की प्रतिमा को भोग लगाएं.!
– विष्‍णु की पूजा करने के बाद पूजन सामग्री लेकर आंवले के वृक्ष की पूजा करें.!
– आंवले के वृक्ष की पूजा से पहले सबसे पहले वृक्ष के चारों ओर की भूमि साफ करें और उसे गाय के गोबर से पवित्र करें.!
– पेड़ की जड़ में एक वेदी बनाकर उस पर कलश स्थापित करें.!
– इस कलश में देवताओं, तीर्थों और सागर को आमंत्रित करें.!
– कलश में पंच रत्न रखें. इसके ऊपर पंच पल्लव रखें और फिर दीप जलाकर रखें.!
– कलश पर श्रीखंड चंदन का लेप करें और वस्त्र पहनाएं.1
– कलश के ऊपर श्री विष्णु के छठे अवतार परशुराम की मूर्ति स्थापित करें और विधिवत पूजा करें.!
– शाम के समय एक बार विष्‍णु जी की पूजा करें और फलाहार ग्रहण करें.!
– रात्रि में भगवत कथा और भजन-कीर्तन करते हुए श्री हरि विष्‍णु का पूजन करें.!
– अगले दिन यानी कि द्वादशी को सुबह ब्राह्मण को भोजन कराएं. उन्‍हें यथा शक्ति दान-दक्षिणा देकर विदा करें.!
– इसके बाद आप स्‍वयं भी भोजन ग्रहण कर व्रत का पारण करें.!

Amalaki Ekadashi: -:आंवला एकादशी कथा:-

प्राचीन काल में एक नगर था उस राज्य में सभी सुखी थे और भक्ति भाव से श्री विष्णु जी की पूजा एवं आराधना किया करते थे. राजा और प्रजा दोनों मिलकर एकादशी व्रत करते थे. एक बार एकादशी व्रत करने के समय सभी जन मंदिर में जागरण कर रहे थे. रात्रि के समय एक शिकारी आया जो भूखा था, वह लगभग सभी पापों का भागी था. मंदिर में अधिक लोग होने के कारण शिकारी को भोजन चुराने का अवसर न मिल सका और उस शिकारी को वह रात्रि जागरण करते हुए बितानी पडी. प्रात:काल होने पर सब जन अपने घर चले गए और शिकारी भी अपने घर चला गया.!

कुछ समय बीतने के बाद शिकारी कि किसी कारणवश मृत्यु हो गई. उस शिकारी ने अनजाने में ही सही आमलकी एकादशी व्रत किया था, इस वजह से उसे कर्मों में शुभ फल प्राप्त हुआ और उसका जन्म एक राजा के यहां हुआ. वह एक बार वह शिकार को गया और डाकूओं के चंगुल में फंस गया. डाकू उसे मारने के लिए शस्त्र का प्रहार करने लगे. किंतु डाकूओं के शस्त्र स्वंय डाकूओं पर ही वार करने लगे. सभी डाकूओं को मृत्यु प्राप्त हुई जब राजा ने पूछा की इस प्रकार मेरी रक्षा करने वाला कौन है.!

इसके जवाब में भविष्यवाणी हुई की तेरी रक्षा श्री विष्णु जी कर रहे है. यह कृपा आपके आमलकी एकादशी व्रत करने के प्रभावस्वरुप हुई है. यह सुनकर राजा ने नमन करते हुए स्वयं को प्रभु के चरणों में समर्पित कर दिया और उन्हीं की भक्ति करते हुए मोक्ष को प्राप्त किया. इस प्रकार जो भी जन प्रभु नारायण जी की उपासना करते हुए एकादशी व्रत का पालन करते हैं उनके समस्त पापों का नाश होता है तथा परमपद की प्राप्ति होती है.!

Amalaki Ekadashi: -:आमलकी एकादशी का महत्‍व:-

आमलकी एकादशी का हिन्‍दू धर्म में विशेष महत्‍व है.आमलकी यानी कि आंवला.आपको बता दें कि शास्त्रों में आंवला को श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है.मान्‍यता है कि श्री हरि विष्णु ने जब सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्मा को जन्म दिया,उसी समय उन्होंने आंवले के वृक्ष को जन्म दिया.आंवले को भगवान विष्णु ने आदि वृक्ष के रूप में प्रतिष्ठित किया है.इसके हर अंग में ईश्वर का स्थान माना गया है.मान्‍यता है कि आमलकी एकादशी के दिन आंवला और श्री हरि विष्‍णु की पूजा करने से मोक्ष की प्राप्‍ति होती है.मान्‍यता है कि जो लोग स्वर्ग और मोक्ष प्राप्ति की कामना रखते हैं,उनको आमलकी एकादशी के दिन आंवले के वृक्ष के नीचे बैठकर भगवान विष्णु की आराधना करनी चाहिए.कहते हैं कि आंवला भगवान विष्णु का प्रिय फल है.आंवले के वृक्ष में भगवान विष्णु का निवास माना जाता है.!

Amalaki Ekadashi: -:’एकादशी जी की आरती’:-

ऊँ जय एकादशी, जय एकादशी, जय एकादशी माता ।
विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति मुक्ति पाता ।। ऊँ।।
तेरे नाम गिनाऊँ देवी, भक्ति प्रदान करनी ।
गण गौरव की देनी माता, शास्त्रों में वरनी ।।ऊँ।।
मार्गशीर्ष के कृ्ष्णपक्ष की “उत्पन्ना” विश्वतारनी का जन्म हुआ।
शुक्ल पक्ष में हुई “मोक्षदा”, मुक्तिदाता बन आई।। ऊँ।।
पौष के कृ्ष्णपक्ष की, “सफला” नामक है।
शुक्लपक्ष में होय “पुत्रदा”, आनन्द अधिक रहै ।। ऊँ।।
नाम “षटतिला” माघ मास में, कृष्णपक्ष आवै।
शुक्लपक्ष में “जया” कहावै, विजय सदा पावै ।। ऊँ।।
“विजया” फागुन कृ्ष्णपक्ष में शुक्ला “आमलकी” ।
“पापमोचनी” कृ्ष्ण पक्ष में, चैत्र महाबलि की ।। ऊँ।।
चैत्र शुक्ल में नाम “कामदा” धन देने वाली ।
नाम “बरुथिनी ” कृ्ष्णपक्ष में, वैसाख माह वाली ।। ऊँ।।
शुक्ल पक्ष में होये “मोहिनी”, “अपरा” ज्येष्ठ कृ्ष्णपक्षी ।
नाम “निर्जला” सब सुख करनी, शुक्लपक्ष रखी ।। ऊँ।।
“योगिनी” नाम आषाढ में जानों, कृ्ष्णपक्ष करनी ।
“देवशयनी” नाम कहायो, शुक्लपक्ष धरी ।। ऊँ।।
“कामिका” श्रावण मास में आवै, कृष्णपक्ष कहिए।
श्रावण शुक्ला होय “पवित्रा”, आनन्द से रहिए।। ऊँ।।
“अजा” भाद्रपद कृ्ष्णपक्ष की, “परिवर्तिनी” शुक्ला।
“इन्द्रा” आश्चिन कृ्ष्णपक्ष में, व्रत से भवसागर निकला।। ऊँ।।
“पापांकुशा” है शुक्ल पक्ष में, आप हरनहारी ।
“रमा” मास कार्तिक में आवै, सुखदायक भारी ।।ऊँ।।
“देवोत्थानी” शुक्लपक्ष की, दु:खनाशक मैया।
लौंद मास में करूँ विनती पार करो नैया ।। ऊँ।।
“परमा” कृ्ष्णपक्ष में होती, जन मंगल करनी।।
शुक्ल लौंद में होय “पद्मिनी”, दु:ख दारिद्र हरनी ।। ऊँ।।
जो कोई आरती एकाद्शी की, भक्ति सहित गावै ।
जन “गुरदिता” स्वर्ग का वासा, निश्चय वह पावै।।ऊँ।।

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