Chaaturmaas Niyamaadi 2023: चातुर्मास नियमादि

'ज्योतिर्विद डी डी शास्त्री'

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Chaaturmaas Niyamaadi: ॐ नमः शिवाय ……चतुर्मास के चार महीने भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते है इसलिए ये समय भक्तों, साधु संतों सभी के लिए अमूल्य होता है. यह चार महीनों में होनेवाला एक वैदिक यज्ञ है जो एक प्रकार का पौराणिक व्रत है जिसे चौमासा भी कहा जाता है. कात्यायन श्रौतसूत्र में इसके महत्व के बारे में बताया गया है. फाल्गुन से इस का आरंभ होने की बात कही गई है इसका आरंभ फाल्गुन, चैत्र या वैशाख की पूर्णिमा से हो सकता है और अषाढ़ शुक्ल द्वादसी या पूर्णिमा पर इसका उद्यापन करने का विधान है. इस अवसर पर चार पर्व हैं वैश्वदेव, वरुणघास, शाकमेघ और सुनाशीरीय. पुराणों में इस व्रत के महत्व के बारे में विस्तारपूर्वक बताया गया है.!

आषाढ़ महीने के शुक्‍ल पक्ष की एकादशी तिथि से चातुर्मास प्रारंभ होता है.इस एकादशी को देवशयनी एकादशी या हरिशयनी एकादशी कहते हैं.देवशयनी एकादशी से शुरू हुआ चातुर्मास देवउठनी एकादशी पर समाप्‍त होता है.यानी कि सावन,भाद्रपद, अश्विन और कार्तिक माह चातुर्मास में आते हैं. चातुर्मास का समय भगवान विष्णु का शयन काल का समय होता है. इस समय भगवान विष्णु आराम करते हैं और देवउठनी एकादशी को जागते हैं. इस बार 29 जून 2023 को देवशयनी एकादशी है. लिहाजा 29 जून से ही चातुर्मास शुरू होगा.!

-:’Chaaturmaas Niyamaadi: इस वर्ष 04 नहीं अपितु 5 माह का होगा चातुर्मास’:-

चातुर्मास की अवधि 4 महीने की होती है. लेकिन इस साल सावन में अधिकमास होने के कारण चातुमार्स की अवधि बढ़कर 5 महीने की हो गई है. देवउठनी एकादशी 23 नवंबर को है और उसी दिन चातुर्मास खत्‍म होगा. चातुर्मास का समय भगवान शिव और भगवान विष्‍णु की कृपा से अपार सुख-समृद्धि पाने का मौका होता है. साथ ही चातुर्मास के दौरान कुछ नियमों का पालन करना बहुत शुभ होता है. साथ ही उन कामों से बचना चाहिए जो चातुर्मास में करने की मनाही की गई है.!

-:चातुर्मास के दौरान कोई भी मांगलिक कार्य ना करें. चातुर्मास में शादी-विवाह, गृह प्रवेश, नामकरण, उपनयन संस्कार, नए व्‍यापार की शुरुआत जैसे शुभ कार्य नहीं करने चाहिए. चातुर्मास में पितृ पक्ष पड़ता है और इस दौरान श्राद्ध कर्म करना, भगवान की पूजा-भक्ति करना ही शुभ होता है.!

-:चातुर्मास के दौरान तामसिक भोजन नहीं करना चाहिए. इन 4-5 महीनों में लहसुन-प्‍याज, नॉनवेज, शराब के सेवन से बचना चाहिए.!

-: चातुर्मास में यदि अतिआवश्यक ना हों नया काम या नया व्‍यापार शुरू करने से बचना चाहिए. इस समय शुरु किए गए काम शुभ फल नहीं देते हैं.!

– :चातुर्मास के दौरान कड़वा नहीं बोलना चाहिए. ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिससे किसी को दुख ना पहुंचें.!

-:चातुर्मास में भगवान सूर्य की आराधना करना चाहिए और पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए.!

वर्षाकाल के चार माह में सभी के लिए साधना पूजा पाठ करने के बारे में कहा गया है. सभी संत एवं ऋषि मुनि इस समय में इस चौमासा व्रत का पालन करते हुए देखे जा सकते हैं. इस दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए तामसिक वस्तुओं का त्याग किया जाता है, चार माह जमीन पर सोते हैं और चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु की आराधना कि जाती है. इसके अलावा उपवास और विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ किया जाना शुभ फल प्रदान करने वाला होता है. चातुर्मास के चार महीनों को शुभ माना जाता है. इसके बाद चातुर्मास का समापन देव उठनी ग्यारस पर होता है और इसी के साथ चातुर्मास का माह भी समाप्त हो जाता है.!

-:’Chaaturmaas Niyamaadi: चातुर्मास व्रत एवं पूजा पाठ’:-

इस समय के दौरान भोजन में किसी भी प्रकार का तामसिक प्रवृति का भोजन नहीं होना चाहिए. भोजन में नमक का प्रयोग करने से व्रत के शुभ फलों में कमी होती है, व्यक्ति को भूमि पर शयन करना चाहिए, जौ, मांस, गेहूं तथा मूंग की दान का सेवन करने से बचना चाहिए. इस अवधि के दौरान सत्य का आचरण करते हुए दूसरों को दु:ख देने वाले शब्दों का प्रयोग करने से बचना चाहिए.!

इसके अतिरिक्त शास्त्रों में व्रत के जो सामान्य नियम बताये गए है, उनका सख्ती से पालन करना चाहिए. सुबह जल्दी उठना चाहिए. नित्यक्रियाओं को करने के बाद, स्नान करना चाहिए. स्नान अगर किसी तीर्थ स्थान या पवित्र नदी में किया जाता है, तो वह विशेष रुप से शुभ रहता है. किसी कारण वश अगर यह संभव न हो, तो इस दिन घर में ही स्नान कर सकता है. स्नान करने के लिये भी मिट्टी, तिल और कुशा का प्रयोग करना चाहिए. यह विष्णु भगवान् का व्रत है अतः ‘नमो- नारायण’ या ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र’ के जप करने से सभी कष्टों से मुक्ति प्राप्त होती है.!

स्नान कार्य करने के बाद भगवान श्री विष्णु जी का पूजन करना चाहिए. पूजन करने के लिए धान्य के ऊपर कुम्भ रख कर, कुम्भ को लाल रंग के वस्त्र से बांधना चाहिए. इसके बाद कुम्भ की पूजा करनी चाहिए. जिसे कुम्भ स्थापना के नाम से जाना जाता है. कुम्भ के ऊपर भगवान की प्रतिमा या तस्वीर रख कर पूजा करनी चाहिए. ये सभी क्रियाएं करने के बाद धूप, दीप और पुष्प से पूजा करनी चाहीए. इस समय पूजा पाठ करने से भगवान श्री विष्णु प्रसन्न होते है. अत: मोक्ष की प्राप्ति होती है.!

-:’Chaaturmaas Niyamaadi: चातुर्मास महत्व’:-

पुराणों में ऎसा उल्लेख है, कि इस दिन से भगवान श्री विष्णु चार मास की अवधि तक पाताल लोक में निवास करते है. आषाढ मास से कार्तिक मास के मध्य के समय को चातुर्मास कहते है. इन चार माहों में भगवान श्री विष्णु क्षीर सागर की अनंत शय्या पर शयन करते है. इसलिये इन माह अवधियों में कोई भी धार्मिक कार्य नहीं किया जाता है. इस अवधि में कृषि और विवाहादि सभी शुभ कार्य नहीं होते. इन दिनों में तपस्वी एक स्थान पर रहकर ही तप करते है. धार्मिक यात्राओं में भी केवल ब्रज यात्रा की जा सकती है. ब्रज के विषय में यह मान्यता है, कि इन चार मासों में सभी देव एकत्रित होकर तीर्थ ब्रज में निवास करते है.!

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