Dussehra 2023: विजयादशमी/दशहरा 2023

'ज्योतिर्विद डी डी शास्त्री'

Share on facebook
Share on twitter
Share on linkedin
Share on whatsapp
Share on email
Share on print

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

जय माता दी/ऊं विजयायै नम:….विजयादशमी/दशहरा असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक है.अधर्म एवं बुराई को समाप्त करके धर्म की स्थापना और शांति का प्रतीक है,विजय दशमी का पर्व आश्विन माह की शुक्ल पक्ष की दशमी को मनाया जाता है.सत्यता का प्रतीक दशहरा अनेक महत्वपूर्ण संदेशों को देते हुए भारत के कोने-कोने में जोश एवं उल्लास के साथ मनाया जाता है.!

विजयदशमी के उपलक्ष पर भारत के कोने-कोने में रामलीला की झाँकियों का मंचन किया जाता है. क्षत्रियों के यहाँ शस्त्रों की पूजा होती है,इस दिन नीलकंठ पक्षी का दर्शन बहुत शुभ माना जाता है. दशहरा या विजया दशमी नवरात्रि के पश्चात दसवें दिन मनाया जाता है.दशहरा एक अबूझ मुहूर्त है. दशहरे के दिन नए व्यापार या कार्य की शुरुआत करना अति शुभ होता है.यह अत्यंत शुभ तिथियों में से एक है,इस दिन वाहन,इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम,स्वर्ण,आभूषण नए वस्त्र इत्यादि खरीदना शुभ होता है. दशहरे के दिन नीलकंठ भगवान के दर्शन करना अति शुभ माना जाता है. दशहरा के दिन लोग नया कार्य प्रारम्भ करते हैं, शस्त्र-पूजा की जाती है.प्राचीन काल में राजा लोग इस दिन विजय की प्रार्थना कर रण-यात्रा के लिए प्रस्थान करते थे इस दिन जगह-जगह मेले लगते हैं. दशहरा का पर्व समस्त पापों काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, अहंकार, हिंसा आदि के त्याग की प्रेरणा प्रदान करता है.!

-:’दशहरा पूजन’:-
दशहरे के दिन सुबह दैनिक कर्म से निवृत होने के पश्चात स्नान आदि करके स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं,उसके बाद गाय के गोबर से दस गोले अर्थात कण्डे बनाए जाते हैं.इन कण्डो पर दही लगाई जाती है.दशहरे के पहले दिन जौ उगाए जाते हैं.वह जौ दसवें दिन यानी दशहरे के दिन इन कण्डों के ऊपर रखे जाते हैं.उसके बाद धूप-दीप जलाकर,अक्षत से रावण की पूजा की जाती है.कई स्थानों पर लड़कों के सिर तथा कान पर यह जौ रखने का रिवाज भी दशहरे के दिन होता है.भगवान राम की झाँकियों पर भी यह जौ चढा़ए जाते हैं.!

-:’विजयादशमी मुहूर्त’:-
इस दिन राम ने रावण का वध किया था.रामायण के अनुसार राम तथा सीता जी के वनवास के दौरान रावण,राम की पत्नी सीता का अपहरण कर लंका ले जाता है.तब भगवान श्री राम अपनी पत्नी सीता जी को रावण के बंधन से मुक्त कराने हेतु राम ने भाई लक्ष्मण,भक्त हनुमान एवं वानरों की सेना के साथ मिलकर रावण के साथ एक बड़ा युद्ध करते हैं. युद्ध के दौरान श्री राम जी नौ दिनों तक युद्ध की देवी मां दुर्गा जी की पूजा करते हैं तथा दशमी के दिन रावण का वध करते हैं और सीता जी को बंधन से मुक्त कराते हैं. इसलिए विजयदशमी एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण दिन है.इस दिन रावण, उसके भाई कुम्भकरण और पुत्र मेघनाद के पुतले जगह-जगह में जलाए जाते हैं.सुबह के समय पूजा करने के बाद संध्या समय में जब “विजय” नामक तारा उदय होता है तब रावण का दाह संस्कार पुतले के रुप में किया जाता है. रावण के पुतले जलाने का कार्य सूर्यास्त से पहले समाप्त किया जाता है, क्योंकि भारतीय संस्कृति में हिन्दु धर्म के अनुसार सूर्यास्त के बाद दाह संस्कार नहीं किया जाता है.!

-:’विजयदशमी पूजन”:-
विजय दशमी या दशहरे के त्यौहार पर अनेक संस्कारों,अनेक संस्करणों को पूर्ण किया जाता है इस त्यौहार के अंतर्गत अनेक प्रकार के रीति-रिवाज़ों का प्रचलन है. जैसे कृषि -महोत्सव या क्षात्र-महोत्सव, सीमोल्लंघन का परिणाम दिग्विजय तक पहुंचा,शमीपूजन, अपराजितापूजन एवं शस्त्रपूजन जैसी कुछ महत्वपूर्ण धार्मिक कृतियां की जाती हैं. दशहरे का एक सांस्कृतिक महत्व भी रहा है. इस समय भारत वर्ष में किसान फसल उगाकर अनाज रूपी संपत्ति घर लाता है और उसी शुभ उमंग के अवसर पर वह उसका पूजन करता है. समस्त भारतवर्ष में यह पर्व विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है. महाराष्ट्र में इस अवसर को सिलंगण के नाम से मनाया जाता है. सायंकाल के समय पर सभी ग्रामीण जन सुंदर-सुंदर नव परिधानों से सुसज्जित होकर गाँव की सीमा पार कर शमी वृक्ष के पत्तों के रूप में ‘स्वर्ण’ लूटकर अपने गांव वापस आते हैं. फिर उस स्वर्ण का परस्पर आदान-प्रदान किया जाता है.

भगवान श्री राम जी ने इसी दिन लंका पर विजय प्राप्त की थी. ज्योतिर्निबन्ध में कहा गया है कि आश्विन शुक्ल दशमी के दिन संध्या तारा उदय होने के समय विजय नामक काल होता है जो समस्त कार्यों को सिद्ध करने वाला होता है. इस त्यौहार के संबंध में एक कथा प्रचलित है जो इस प्रकार है. एक बार कि बात है माता पार्वती जी ने भगवान शिव से विजयादशमी त्यौहार के विषय में तथा इस पर्व का क्या फल प्राप्त होता है जानना चाहा. पार्वती जी के कथन को सुन भगवान भोलेनाथ उनसे कहते हैं कि आश्व्नि शुक्ला दशमी को संध्या समय में तारा उदय होने के समय विजय नामक काल होता है. यह सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाला होता है और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने हेतु इसी समय प्रस्थान करने से विजय की प्राप्ति होती है. यदि इस दिन श्रवण नक्षत्र बने तो यह और भी शुभ होता है. भगवान श्री राम जी ने इसी विजय काल समय लंका पर चढ़ाई की थी व विजय प्राप्त की थी इस कारण यह दिन बहुत पवित्र माना जाता है.!

-:’अपराजिता पूजन’:-
विजयदशमी है को अपराजिता पूजा के नाम से भी जाना जाता है.अपराजिता संपूर्ण ब्रह्मांड की शक्तिदायिनी और ऊर्जा हैं, अपराजिता पूजन नाम के अनुरूप ही पहचान देता है. यह विष्णु को प्रिय है और प्रत्येक परिस्थिति में विजय प्रदान करने वाली होती है. तंत्र शास्त्र में युद्ध अथवा मुकदमेबाजी के मामले में यह बहउत प्रभावशाली पूजन होता है. शास्त्रों में इसका बहुत महत्व बताया गया है.!

-:’शस्त्रपूजन’:-
दशहरा के दिन शस्त्रपूजन कर देवताओं की शक्ति का आवाहन किया जाता है,इस दिन प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में प्रतिदिन उपयोग मे आने वाली वस्तुओं का पूजन करता है. यह त्योहार क्षत्रियों का मुख्य पर्व है इसमें वह अपराजिता देवी की पूजा करते हैं. यह पूजन भी सर्वसुख देने वाला होता है.!
दशहरा के दिन लोग नया कार्य प्रारम्भ करते हैं, शस्त्र-पूजा की जाती है. प्राचीन काल में राजा लोग इस दिन विजय की प्रार्थना कर रण-यात्रा के लिए प्रस्थान करते थे. इस दिन जगह-जगह मेले लगते हैं. दशहरा का पर्व समस्त पापों काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, अहंकार, हिंसा आदि के त्याग की प्रेरणा प्रदान करता है.!

-:’शमी पूजन’:-
विजयादशमी या दशहरे के दिन शमी पूजन एवं अश्मंतक के वृक्ष का पूजन करना चाहिए. इस पूजा के साथ एक कथा जुड़ी हुई है जो इस प्रकार है की माता पार्वती जी शमी वृक्ष की महत्ता के बारे में भगवान शिव जी से पूछती हैं तब शिव भगवान उनसे कहते हैं कि अज्ञात वास के समय अर्जुन ने अपने शस्त्रों को शमी के वृक्ष की कोटर या खोह में रख दिया था और राजा विराट के राज्य में वृहन्ना के वेश में रहने लगते हैं.!
बाद में विराट के पुत्र की सहायता हेतु अर्जुन शमी के वृक्ष पर से अपने धनुष बाण उठाकर शत्रुओं पर विजय प्राप्त करते हैं. इस प्रकार शमी वृक्ष ने अर्जुन के शस्त्रों की रक्षा की थी. इसके अतिरिक्त रामजी ने जब लंका पर चढाई की तब शमी वृक्ष ने उनसे कहा था की आपकी विजय अवश्य होगी, इसलिए विजयकाल में शमी वृक्ष की भी पूजा का विशेष विधान है. शमीवृक्ष यदि उपलब्ध न हो, तो अश्मंतक वृक्ष का पूजन करते हैं. शमी वृक्ष पूजन करके इसकी पत्तियों को स्वर्ण पत्तियों के रूप में एक-दूसरे को प्रदान किया जाता है.!

-:’सीमोल्लंघन’:-
क्षत्रिय लोग इसे अपना एक महत्वपूर्ण त्यौहार मानते हैं. वह मानते हैं की शत्रु से युद्ध का प्रसंग न होने पर भी इस काल में राजाओं को अपनी सीमा का उल्लंघन अवश्य करना चाहिए. एक बार राजा युधिष्ठिर के पूछने पर श्री कृष्ण जी उन्हें इसका महत्व बताते हुए कहा था कि विजयदशमी के दिन राजा को अपने दासों व हाथी- घोड़ों को सजाना चाहिए तथा धूम-धाम के साथ मंगलाचार करना चाहिए.!

राजा अपने पुरोहित के साथ पूर्व दिशा में प्रस्थान कर अपने राज्य की सीमा से बाहर जाए और वहां वास्तु पूजा करके अष्ट-दिग्पालों तथा पार्थ देवता का पूजन करे. शत्रु की प्रतिमा अथवा पुतला बनाकर उसकी छाती में बाण लगाए और पुरोहित वैदिक मंत्रों का उचारण करे. सभी कार्यों को पूर्ण करके पुन: अपने राज्य में लौट आए. इस प्रकार जो भी राजा इस विधि से विजय पूजा करता है वह सदैव अपने शत्रु पर विजय प्राप्त करता है.!

-:’दशहरा पूजन महत्व’:-
दशहरा के दिन मां दुर्गा और भगवान राम की पूजा की जाती है.मां दुर्गा जहां शक्ति की प्रतीक हैं वहीं भगवान राम मर्यादा,धर्म और आदर्श व्यक्तित्व के प्रतीक हैं.जीवन में शक्ति,मर्यादा,धर्म और आदर्श का विशेष महत्व है.जिस व्यक्ति के भीतर ये गुण हैं वह सफलता को प्राप्त करता है.साल में कुल तीन मुहूर्त सबसे ज्यादा शुभ माने गये हैं,जिनमें :- चैत्र शुक्ल प्रतिपदा,आश्विन शुक्ल दशमी,वैशाख शुक्ल तृतीया..!

यह तीनों ही दिन किसी भी काम की शुरुआत करने के लिए सबसे शुभ माने जाते हैं,इसलिए कई लोग अपने नए काम की शुरुआत दशहरे के दिन से करते हैं,क्षत्रिय समाज इस दिन अपने शस्त्रों की पूजा करता है जिसे आयुध पूजा कहते हैं,ब्राह्मण समाज इस दिन देवी सरस्वती की पूजा करते हैं, नवरात्रि से शुरू हुई रामलीला का समापन इस दिन रावण और उसके भाईयों के पुतलों को जलाकर किया जाता है,इस तरह से इस दिन भगवान राम की जीत का जश्न मनाया जाता है.!

नोट :- अपनी पत्रिका से सम्वन्धित विस्तृत जानकारी अथवा ज्योतिष,अंकज्योतिष,हस्तरेखा,वास्तु एवं याज्ञिक कर्म हेतु सम्पर्क करें…!

Share on facebook
Share on twitter
Share on linkedin
Share on whatsapp
Share on email
Share on print
नये लेख