Sawan Somvar Vrat Katha: श्रावण सौमवार व्रत कथा विशेषांक

'ज्योतिर्विद डी डी शास्त्री'

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Sawan Somvar Vrat Katha: ॐ नमः शिवाय……सोमवार अथवा श्रावण सोमवार व्रत भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिये किया जाता है.सोमवार व्रत में भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना की जाती है.इस व्रत को स्त्री- पुरुष दोनों कर सकते है. इस व्रत को भी अन्य व्रतों कि तरह पूर्ण विधि-विधान से करना कल्याणकारी रहता है. शास्त्रों के अनुसार सोमवार के व्रत की अवधि सूर्योदस्य से लेकर सूर्यास्त तक के मध्य की होती है. इस व्रत में क्योकि रात्रि में भोजन किया जा सकता है, इसलिये इस व्रत को नक्तव्रत भी कहा जाता है.!

-:’Sawan Somvar Vrat Katha: सोमवार व्रत का प्रारम्भ’:-

सोमवार के व्रत का प्रारम्भ शुक्ल पक्ष की प्रथम सोमवार या फिर श्रावण मास के प्रथम सोमवार से करना शुभ होता है.इस व्रत का विधि-विधान भी श्रावण मास में भगवान भोलेनाथ के लिये किये जाने व्रतों के समान ही है. श्रावण मास में पार्थिव शिवलिंग की पूजा विशेष रुप से की जाती है.!

अगर कोई श्रावण मास में सोमवार का व्रत प्रारम्भ नहीं कर पाता है, तो वह चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार, वैशाख मास के शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार या फिर मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार से शुरु किये जा सकते है. इन सभी में भी श्रावण मास को सबसे अधिक शुभ कहा गया है. श्रावण मास भगवान शिव को सबसे अधिक प्रिय है. इस मास में सोमवार व्रत प्रारम्भ करनें से उपवासक के सभी पापों का नाश होता है.!

-:’Sawan Somvar Vrat Katha: सोमवार व्रतारम्भ विधि’:-

ऊपर बताये गये किसी शुभ माह समय में इस व्रत का प्रारम्भ किया जा सकता है. व इस व्रत को एक पांच साल अथवा सोलह सोमवार पूर्ण श्रद्धा व विश्वास के साथ करना चाहिए. उपवास करने वाले व्यक्ति को चाहिए कि वह उपवास के दिन प्रात:काल में उठकर नित्यक्रियाओं से निवृ्त होकर स्नान के जल में जल में कुछ काले तिल डाल कर स्नान करें.!
स्नान करने के बाद गंगा जल या पवित्र जल से पूरे घर में छिडकाव करें. घर के ईशाण कोण में एक शांत स्थान में भगवान शिव की मूर्ति या चित्र स्थापित करें, और “ऊँ नम: शिवाय:” मंत्र का जाप करते हुए श्वेत फूलों, चंदन, चावल, पंचामृ्त, सुपारी, फल, गंगाजल से शिव पार्वती के समक्ष इस व्रत का संकल्प लें. संकल्प करते समय निम्न मंत्र का उच्चारण करना चाहिए.!

II.‘मम क्षेमस्थैर्यविजयारोग्यैश्वर्याभिवृद्धयर्थं सोमव्रतं करिष्ये’.II

संकल्प और पूजन करने के बाद व्रत की कथा सुननी चाहिए. इसके बाद आरती कर प्रसाद का वितरण करना चाहिए. इस समय भोजन में नमक का प्रयोग करने से बचना चाहिए.!
व्रत के उद्ध्यापन में सफेद वस्तुओं का दान करना चाहिए. जैसे: चावल, सफेद वस्त्र, बर्फी, दूध, दही, चांदी आदि का दान इस व्रत में करना शुभ होता है. यह व्रत मानसिक शान्ति के लिये भी किया जाता है. पूरे दिन उपवास कर भगवान शिव के मंदिर में भगवान शिव के दर्शन करने चाहिए. और सूर्यास्त होने पर भोग के रुप में दूध से बनी वस्तुओं का प्रयोग करना चाहिए.!
भगवान भोले नाथ को भोग लगा कर, धूप, दीप और सुगण्ध से पूजन कर चन्द्र देव को अर्ध्य देते हुए ऊपर दिये गये मंत्र का स्मरण करना चाहिए. तथा सोलह सोमवार के व्रत पूरे हो जाने पर उद्ध्यापन के दिन ब्राह्माण तथा बच्चों को खीर पूरी मिष्ठान आदि भोजन करा कर यथाशक्ति दान देना चाहिए. सूर्यास्त होने पर शिव का पूजन प्रदोष काल में करना सबसे अधिक शुभ होता है.!

-:’Sawan Somvar Vrat Katha: श्रावण सौमवार व्रत कथा’:-

श्रावण सौमवार की कथा के अनुसार अमरपुर नगर में एक धनी व्यापारी रहता था,दूर-दूर तक उसका व्यापार फैला हुआ था,नगर में उस व्यापारी का सभी लोग मान-सम्मान करते थे,इतना सबकुछ होने पर भी वह व्यापारी अंतर्मन से बहुत दुखी था क्योंकि उस व्यापारी का कोई पुत्र नहीं था,दिन-रात उसे एक ही चिंता सताती रहती थी,उसकी मृत्यु के बाद उसके इतने बड़े व्यापार और धन-संपत्ति को कौन संभालेगा.!

पुत्र पाने की इच्छा से वह व्यापारी प्रति सोमवार भगवान शिव की व्रत-पूजा किया करता था,सायंकाल को व्यापारी शिव मंदिर में जाकर भगवान शिव के सामने घी का दीपक जलाया करता था,उस व्यापारी की भक्ति देखकर एक दिन पार्वती ने भगवान शिव से कहा- ‘हे प्राणनाथ, यह व्यापारी आपका सच्चा भक्त है,कितने दिनों से यह सोमवार का व्रत और पूजा नियमित कर रहा है,भगवान आप इस व्यापारी की मनोकामना अवश्य पूर्ण करें..!

भगवान शिव ने मुस्कराते हुए कहा- ‘हे पार्वती! इस संसार में सबको उसके कर्म के अनुसार फल की प्राप्ति होती है,प्राणी जैसा कर्म करते हैं, उन्हें वैसा ही फल प्राप्त होता है,इसके बावजूद पार्वतीजी नहीं मानीं,उन्होंने आग्रह करते हुए कहा- ‘नहीं प्राणनाथ! आपको इस व्यापारी की इच्छा पूरी करनी ही पड़ेगी,यह आपका अनन्य भक्त है,प्रति सोमवार आपका विधिवत व्रत रखता है और पूजा-अर्चना के बाद आपको भोग लगाकर एक समय भोजन ग्रहण करता है,आपको इसे पुत्र-प्राप्ति का वरदान देना ही होगा..!
पार्वती का इतना आग्रह देखकर भगवान शिव ने कहा- ‘तुम्हारे आग्रह पर मैं इस व्यापारी को पुत्र-प्राप्ति का वरदान देता हूं,लेकिन इसका पुत्र 16 वर्ष से अधिक जीवित नहीं रहेगा..!

उसी रात भगवान शिव ने स्वप्न में उस व्यापारी को दर्शन देकर उसे पुत्र-प्राप्ति का वरदान दिया और उसके पुत्र के 16 वर्ष तक जीवित रहने की बात भी बताई,भगवान के वरदान से व्यापारी को खुशी तो हुई, लेकिन पुत्र की अल्पायु की चिंता ने उस खुशी को नष्ट कर दिया,व्यापारी पहले की तरह सोमवार का विधिवत व्रत करता रहा,कुछ महीने पश्चात उसके घर अति सुंदर पुत्र उत्पन्न हुआ,पुत्र जन्म से व्यापारी के घर में खुशियां भर गईं,बहुत धूमधाम से पुत्र-जन्म का समारोह मनाया गया..!

व्यापारी को पुत्र-जन्म की अधिक खुशी नहीं हुई क्योंकि उसे पुत्र की अल्प आयु के रहस्य का पता था,यह रहस्य घर में किसी को नहीं मालूम था। विद्वान ब्राह्मणों ने उस पुत्र का नाम अमर रखा..!

जब अमर 12 वर्ष का हुआ तो शिक्षा के लिए उसे वाराणसी भेजने का निश्चय हुआ,व्यापारी ने अमर के मामा दीपचंद को बुलाया और कहा कि अमर को शिक्षा प्राप्त करने के लिए वाराणसी छोड़ आओ,अमर अपने मामा के साथ शिक्षा प्राप्त करने के लिए चल दिया,रास्ते में जहां भी अमर और दीपचंद रात्रि विश्राम के लिए ठहरते, वहीं यज्ञ करते और ब्राह्मणों को भोजन कराते थे…!

लंबी यात्रा के बाद अमर और दीपचंद एक नगर में पहुंचे,उस नगर के राजा की कन्या के विवाह की खुशी में पूरे नगर को सजाया गया था,निश्चित समय पर बारात आ गई लेकिन वर का पिता अपने बेटे के एक आंख से काने होने के कारण बहुत चिंतित था,उसे इस बात का भय सता रहा था कि राजा को इस बात का पता चलने पर कहीं वह विवाह से इनकार न कर दें। इससे उसकी बदनामी होगी..!
वर के पिता ने अमर को देखा तो उसके मस्तिष्क में एक विचार आया। उसने सोचा क्यों न इस लड़के को दूल्हा बनाकर राजकुमारी से विवाह करा दूं। विवाह के बाद इसको धन देकर विदा कर दूंगा और राजकुमारी को अपने नगर में ले जाऊंगा…!

वर के पिता ने इसी संबंध में अमर और दीपचंद से बात की। दीपचंद ने धन मिलने के लालच में वर के पिता की बात स्वीकार कर ली। अमर को दूल्हे के वस्त्र पहनाकर राजकुमारी चंद्रिका से विवाह करा दिया गया,राजा ने बहुत-सा धन देकर राजकुमारी को विदा किया..!

अमर जब लौट रहा था तो सच नहीं छिपा सका और उसने राजकुमारी की ओढ़नी पर लिख दिया ‘राजकुमारी चंद्रिका, तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ था,मैं तो वाराणसी में शिक्षा प्राप्त करने जा रहा हूं,अब तुम्हें जिस नवयुवक की पत्नी बनना पड़ेगा, वह काना है,जब राजकुमारी ने अपनी ओढ़नी पर लिखा हुआ पढ़ा तो उसने काने लड़के के साथ जाने से इनकार कर दिया,राजा ने सब बातें जानकर राजकुमारी को महल में रख लिया,उधर अमर अपने मामा दीपचंद के साथ वाराणसी पहुंच गया,अमर ने गुरुकुल में पढ़ना शुरू कर दिया,जब अमर की आयु 16 वर्ष पूरी हुई तो उसने एक यज्ञ किया,यज्ञ की समाप्ति पर ब्राह्मणों को भोजन कराया और खूब अन्न, वस्त्र दान किए। रात को अमर अपने शयनकक्ष में सो गया,शिव के वरदान के अनुसार शयनावस्था में ही अमर के प्राण-पखेरू उड़ गए,सूर्योदय पर मामा अमर को मृत देखकर रोने-पीटने लगा,आसपास के लोग भी एकत्र होकर दुःख प्रकट करने लगे.!

मामा के रोने, विलाप करने के स्वर समीप से गुजरते हुए भगवान शिव और माता पार्वती ने भी सुने,पार्वतीजी ने भगवान से कहा- ‘प्राणनाथ! मुझसे इसके रोने के स्वर सहन नहीं हो रहे। आप इस व्यक्ति के कष्ट अवश्य दूर करें.!

भगवान शिव ने पार्वतीजी के साथ अदृश्य रूप में समीप जाकर अमर को देखा तो पार्वतीजी से बोले- ‘पार्वती,यह तो उसी व्यापारी का पुत्र है। मैंने इसे 16 वर्ष की आयु का वरदान दिया था। इसकी आयु तो पूरी हो गई.!

पार्वतीजी ने फिर भगवान शिव से निवेदन किया- ‘हे प्राणनाथ! आप इस लड़के को जीवित करें। नहीं तो इसके माता-पिता पुत्र की मृत्यु के कारण रो-रोकर अपने प्राणों का त्याग कर देंगे। इस लड़के का पिता तो आपका परम भक्त है,वर्षों से सोमवार का व्रत करते हुए आपको भोग लगा रहा है,पार्वती के आग्रह करने पर भगवान शिव ने उस लड़के को जीवित होने का वरदान दिया और कुछ ही पल में वह जीवित होकर उठ बैठा.!

शिक्षा समाप्त करके अमर मामा के साथ अपने नगर की ओर चल दिया,दोनों चलते हुए उसी नगर में पहुंचे,जहां अमर का विवाह हुआ था,उस नगर में भी अमर ने यज्ञ का आयोजन किया,समीप से गुजरते हुए नगर के राजा ने यज्ञ का आयोजन देखा.!

राजा ने अमर को तुरंत पहचान लिया। यज्ञ समाप्त होने पर राजा अमर और उसके मामा को महल में ले गया और कुछ दिन उन्हें महल में रखकर बहुत-सा धन, वस्त्र देकर राजकुमारी के साथ विदा किया.!

रास्ते में सुरक्षा के लिए राजा ने बहुत से सैनिकों को भी साथ भेजा। दीपचंद ने नगर में पहुंचते ही एक दूत को घर भेजकर अपने आगमन की सूचना भेजी,अपने बेटे अमर के जीवित वापस लौटने की सूचना से व्यापारी बहुत प्रसन्न हुआ.!

व्यापारी ने अपनी पत्नी के साथ स्वयं को एक कमरे में बंद कर रखा था,भूखे-प्यासे रहकर व्यापारी और उसकी पत्नी बेटे की प्रतीक्षा कर रहे थे,उन्होंने प्रतिज्ञा कर रखी थी कि यदि उन्हें अपने बेटे की मृत्यु का समाचार मिला तो दोनों अपने प्राण त्याग देंगे.!

व्यापारी अपनी पत्नी और मित्रों के साथ नगर के द्वार पर पहुंचा,अपने बेटे के विवाह का समाचार सुनकर, पुत्रवधू राजकुमारी चंद्रिका को देखकर उसकी खुशी का ठिकाना न रहा,उसी रात भगवान शिव ने व्यापारी के स्वप्न में आकर कहा- ‘हे श्रेष्ठी! मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने और व्रतकथा सुनने से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र को लंबी आयु प्रदान की है,व्यापारी बहुत प्रसन्न हुआ. !

सोमवार का व्रत करने से व्यापारी के घर में खुशियां लौट आईं,शास्त्रों में लिखा है कि जो स्त्री-पुरुष सोमवार का विधिवत व्रत करते और व्रतकथा सुनते हैं उनकी सभी इच्छाएं पूरी होती हैं….!

-:’Sawan Somvar Vrat Katha: सोमवार व्रत का ज्योतिषिय महत्व’:-

शास्त्रों के अनुसार जिन व्यक्तियों की कुण्डली में चन्द्र पीडित हों, या फिर चन्द्र अपने शुभ फल देने में असमर्थ हों, उन व्यक्तियों को चन्द्र ग्रह की शान्ति के लिये, सोमवार के व्रत का पालन करना चाहिए. निराशावाद व मानसिक सुखों में वृ्द्धि के लिये भी इस व्रत को करना लाभकारी रहता है,चन्द्र ग्रह के देव भगवान शिव है. क्योकि भगवान शिव ने चन्द्र को अपने सिर पर धारण किया हुआ है.!

और सभी ग्रहों में चन्द्र ही एक ऎसा ग्रह है तो पृ्थ्वी के सबसे निकट होने के कारण हमारे जीवन, हमारे मन को सबसे अधिक प्रभावित करता है. इसलिये जिन व्यक्तियों की जन्म राशि, जन्म नक्षत्र चन्द्र की हों, उन व्यक्तियों को सोमवार के व्रत अवश्य लाभ देते है,माता के स्वास्थय व मातृ सुख को प्राप्त करने के लिये भी इस व्रत को किया जा सकता है.!

नोट :- अपनी पत्रिका से सम्वन्धित विस्तृत जानकारी अथवा ज्योतिष, अंकज्योतिष,हस्तरेखा, वास्तु एवं याज्ञिक कर्म हेतु सम्पर्क करें.!

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