Varuthini Ekadashi Vrat Katha: वरूथिनी एकादशी व्रत

'ज्योतिर्विद डी डी शास्त्री'

Varuthini Ekadashi Vrat Katha: वरूथिनी एकादशी व्रत
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Varuthini Ekadashi Vrat Katha: ॐ नमो नारायण….इस वर्ष 16 अप्रैल 2023 के दिन वरूथिनी एकादशी व्रत किया जाएगा. यह व्रत वैशाख कृष्ण पक्ष की एकादशी को किया जाता है. पद्मपुराण में वरूथिनी एकादशी के विषय में तथ्य प्राप्त होते हैं जिसके अनुसार भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर के पूछने पर की वैशाख माह के कृष्णपक्ष की एकादशी का फल एवं महात्मय क्या है तो उनके इस कथन पर भगवान उन्हें कहते हैं कि हे धर्मराज लोक और परलोक में सौभाग्य प्रदान करने वाली है वरूथिनी एकादशी के व्रत करने से साधक को लाभ की प्राप्ति होती है तथा उसके पापों का नाश संभव हो जाता है. यह एकादशी भक्त को समस्त प्रकार के भोग एवं मोक्ष प्रदान करने वाली होती है…!
वरूथिनी एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को कठिन तपस्या करने के समान फल की प्राप्ति होती है. इस व्रत के नियम अनुसार व्रत रखने वाले को दशमी तिथि के दिन से ही नियम धारण कर लेना चाहिए. संयम व शुद्ध आचरण का पालन करते हुए एकादशी के दिन प्रात:काल समस्त क्रियाओं से निवृत्त होकर भगवान विष्णु जी का पूजन करना चाहिए. विधि पूर्वक वरूथिनी एकादशी का व्रत करते हुए एकादशी की रात्रि में जागरण करना चाहिए तथा भजन किर्तन करते हुए श्री हरि की का मनन करते रहना चाहिए…!

-:’Varuthini Ekadashi Vrat Katha: वरूथिनी एकादशी शुभ मुहूर्त’:-

वरुथिनी व्रत के पुण्‍य की बात करें तो वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि शनिवार 15 अप्रैल 2023 को रात्रि 20 बजकर 46 मिनट से आरम्भ हो रही है तथा रविवार 16 अप्रैल को सायंकाल 18 बजकर 15 मिनट पर समाप्‍त होगी.उदया तिथि के अनुसार वरुथिनी एकादशी का व्रत रविवार 16 अप्रैल को ही रखा जाएगा.इस एकादशी व्रत का पारण सोमवार 17 अप्रैल को प्रातः 07 बजकर 11 मिनट से 12 बजकर 47 मिनट के मध्य किया जाएगा.!

-:’Varuthini Ekadashi Vrat Katha: वरूथिनी एकादशी कथा’:-

इस एकादशी के विषय में एक कथा प्रचलित है जिसके अनुसार मांधाता, इक्ष्वाकुवंशीय नरेश थे इनकी प्रशिद्धि दूर दूर तक थी. इनके विषय में कहा जाता है कि इन्हें सौ राजसूय तथा अश्वमेध यज्ञों का कर्ता और दानवीर, धर्मात्मा चक्रवर्ती सम्राट् जो वैदिक अयोध्या नरेश मंधातृ जैसा अभिन्न माना जाता था. यादव नरेश शशबिंदु की कन्या बिंदुमती इनकी पत्नी थीं जिनसे मुचकुंद, अंबरीष और पुरुकुत्स नामक तीन पुत्र और पचास कन्याएँ उत्पन्न हुई थीं जो एक ही साथ सौभरि ऋषि से ब्याही गई थीं…!
पुत्र प्राप्ति हेतु यज्ञ के हवियुक्त मंत्रपूत जल को प्यास में भूल से पी लेने के कारण युवनाश्व को गर्भ रह गया जिसे ऋषियों ने उसका पेट फाड़कर निकाला. वह गर्भ एक पूर्ण बालक के रूप में उत्पन्न हुआ था जो इंद्र की तर्जनी उँगली को चूसकर रहस्यात्मक ढंग से पला और बढ़ा हुआ था. इंद्र द्वारा दुध पिलाने तथा पालन करने के कारण इनका नाम मांधाता पड़ा.यह बालक आगे चलकर पर पराक्रमी राजा बना.!

इन्होंने विष्णु जी से राजधर्म और वसुहोम से दंडनीति की शिक्षा ली थी. इसी वरूथिनी एकादश के प्रभाव से राजा मान्धाता स्वर्ग को गए थे क्योंकि गर्व से चूर होकर और स्वयं को उच्च मानते हुए इनके द्वारा कई गलत कार्य भी हुए जिनके प्रभाव स्वरूप इन्हें स्वर्ग की प्राप्ति नहीं हुई अत: अपने पापों से मुक्ति पाने हेतु क्षमायाचना स्वरूप इन्होंने इस एकादशी व्रत का पालन किया जिसके प्रभाव से इन्हें स्वर्ग की प्राप्ति संभव हो सकती….!
इसी प्रकार राजा धुन्धुमार को भगवान शिव ने एक बार क्रोद्धवश श्राप दे दिया था जिसके कारण उन्हें बहुत सारे कष्टों की प्राप्ति हुई उनसे मुक्ति के मार्ग के लिए धुन्धुमार ने तब इस एकादशी का व्रत रखा जिससे उन्हें श्राप से मुक्ति प्राप्त हुए और वह उत्तम लोक को प्राप्त हुए…!

-:’Varuthini Ekadashi Vrat Katha: वरूथ‍िनी एकादशी का महत्‍व’:-

वरूथिनी शब्द संस्कृत भाषा के ‘वरूथिन्’ से बना है,जिसका मतलब है- प्रतिरक्षक,कवच या रक्षा करने वाला.मान्‍यता है कि इस एकादशी का व्रत करने से विष्‍णु भगवान हर संकट से भक्‍तों की रक्षा करते हैं,इसलिए इसे वरूथिनी ग्यारस कहा जाता है.पद्म पुराण के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण इस व्रत से मिलने वाले पुण्य के बारे में युधिष्ठिर को बताते हैं,पृथ्वी के सभी मनुष्यों के पाप-पुण्य का लेखा-जोखा रखने वाले भगवान चित्रगुप्त भी इस व्रत के पुण्य का हिसाब-किताब रख पाने में सक्षम नहीं हैं…!

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