Shri Kashi Vishwanath: श्रावण विशेषांक,श्री विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग

'ज्योतिर्विद डी डी शास्त्री'

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ॐ सर्वेश्वराय विद्महे, शूलहस्ताय धीमहि.तन्नो रूद्र प्रचोदयात् ||

ॐ नमः शिवाय……भारत देश धार्मिक आस्था और विश्वास का देश है.तथा ईद देश में अनेकानेक धर्मस्थल है.इन धर्मस्थलों “ज्योतिर्लिंगों” को विशेष स्थान प्राप्त हैं,और इन दिव्य द्वादश ज्योतिर्लिंगों की विशेष रुप से पूजा की जाती है.!

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।
उज्जयिन्यां महाकालं ओम्कारम् अमलेश्वरम्॥
परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम्।
सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥
वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।
हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये॥
एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः।
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥

श्रीविश्वनाथ ज्योतिर्लिंग उत्तर प्रदेश के काशी नामक स्थान में है.और यहीं से वर्तमान में हमारे प्रधानमंत्री सांसद भी हैं, और आपको उनका ये वाक्य भी याद ही होगा की न मुझे किसी ने भेजा हैं न मैं स्वयं आया हूँ मुझे तो मां गंगा और काशी विश्वनाथ ने बुलाया हैं,मित्रों काशी सनातन धर्म स्थलों में सबसे अधिक महत्व रखती है.सभी धर्म स्थलों में काशी का अत्यधिक महत्व कहा गया है.इस स्थान की मान्यता है,कि यह स्थान सदैव बना रहेगा.अगर कभी इस पृ्थ्वी पर किसी तरह की कोई प्रलय आती भी है, तो इसकी रक्षा के लिए भगवान शिव इस स्थान को अपने त्रिशूल पर धारण कर लेगें और प्रलय के टल जाने पर काशी को इसके स्थान पर रख देगें.I
सानन्दमानन्दवने वसन्त-मानन्दकन्दं हतपापवृन्दम्.।
वाराणसीनाथमनाथनाथं,श्रीविश्वनाथं शरणं प्रपद्ये॥

-:काशी मोक्ष नगरी :-
धर्म शास्त्रों के अनुसार सृष्टि का प्रारम्भ भी इसी स्थान को कहा गया है.इस स्थान के विषय में एक पौराणिक कथा प्रसिद्ध है,कि सृ्ष्टि रचना के लिए भगवान विष्णु की उपासना इसी स्थान पर श्री विष्णु जी ने की थी.इसके अतिरिक्त ऋषि अगस्त्य ने इसी स्थान पर भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए उपासना की थी.!

इस नगरी से कई मान्यताएं जुडी हुई है.काशी धर्म स्थल के विषय में कहा जाता है,कि इस स्थान पर जो भी व्यक्ति अंतिम सांस लेता है.उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है.इस स्थान की महिमा के विषय में जितना कहा जाए कम है.कहा जाता है कि यहां मृ्त्यु को प्राप्त करने वाले व्यक्ति को भगवान शंकर मृ्त्यु धारक के कान में मोक्ष प्राप्ति का उपदेश देते है.इस मंत्र को सुनने मात्र से पापी से पापी व्यक्ति भी भव सागर को पार कर श्री विष्णु लोक में जाता है.!

अधर्मी और अनाचारी भी यहां मृ्त्यु होने के बाद संसार के बंधनों से मुक्त हो गए है.प्राचीन धर्म शास्त्र मत्स्य पुराण के अनुसार काशी नगरी जप,ध्यान की नगरी है.यहां आकर व्यक्ति को उसके दु:खों से मुक्ति मिलती है.इसी पवित्र नगरी में विश्वनाथ मंदिर ज्योतिर्लिंग स्थित है.इस ज्योतिर्लिंग को विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से भी जाना जाता है.!

-: मणिककर्णिका,दशाश्वमेध,लोलार्क,बिंदूमाधव और केशव :-
श्री विश्वनाथ धाम में ही पांच प्रमुख तीर्थ है.इसमे दशाश्वमेध,लोलार्क,बिंदूमाधव,केशव और मणिकर्णिका है.एक स्थान पर ही पांच धर्म स्थल होने के कारण इस स्थान को परमगति देने वाला स्थान कहा गया है.श्री विश्वनाथ धाम की महत्वता इसके साथ स्थित अन्य पांच तीर्थ स्थल भी बढाते है.!

-: श्रीविश्वनाथ ज्योतिर्लिंग कथा :-
श्रीविश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के संबन्ध में एक पौराणिक कथा प्रचलित है.बात उस समय की है जब भगवान शंकर पार्वती जी से विवाह करने के बाद कैलाश पर्वत पर ही रहते थें.परन्तु पार्वती जी को यह बात अखरती थी कि विवाह के बाद भी उन्हें अपने पिता के घर में ही रहना पडे़.इस दिन अपने मन की यह इच्छा देवी पार्वती जी ने भगवान शिव के सम्मुख रख दी.अपनी प्रिया की यह बात सुनकर भगवान शिव कैलाश पर्वत को छोड कर देवी पार्वती के साथ काशी नगरी में आकर रहने लगे और काशी नगरी में आने के बाद भगवान शिव यहां ज्योतिर्लिंग के रुप में स्थापित हो गए.तभी से काशी नगरी में विश्वनाथ ज्योतिर्लिग ही भगवान शिव का निवास स्थान बन गया है.!

-:श्रीविश्वनाथ ज्योतिर्लिग महत्व :-
काशी नगरी की वि़शेषता श्रीविश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के कारण ही आज अन्य सभी धर्म स्थलों में सबसे अधिक है.जो जन इस नगरी में आकर भगवान शिव का पूजन और दर्शन करता है.उसे उसके समस्त पापों से मुक्ति मिलती है.भगवान शिव अपने भक्त की सभी पापों को स्वयं वहन करते है और श्रधालु को सुख और कामना पूर्ति का आशिर्वाद देते है.!
भगवान शिव की नगरी कही जाने वाली काशी में स्थित पांच अन्य तीर्थ स्थल भी है.फिर भी भगवान शिव को परम सत्य सुन्दर और परमात्मा कहा गया है.भगवान शिव सत्यम शिवमऔर सुंदरम है.वह ही सत्य है.वह ही ब्रह्मा है,और शिव ही शुभ होकर आत्मा के कारक है.!

इस जीवन में भगवान शिव और देवी पार्वती के अलावा कुछ भी अन्य जानने योग्य नहीं है.शिव ही आदि और शिव ही इस सृ्ष्टि का अंत है.जो भगवान शिव की शरण में नहीं जाता है,वह पाप और दु:ख में डूबता जाता है.शिव पुराण में शिव के रुप का वर्णन इस प्रकार किया गया है.भगवान शिव की लम्बी लम्बी जटाएं है.भगवान शिव के हाथों में धनुष है.भगवान शिव दिगम्बर है.भगवान शिव नागराज का हार धारण किए हुए है.रुद्र की माला धारण किये हुए है.पुराणों में भगवान शिव को शंकर और महेश के नाम से उच्चारित किया गया है.!
अपने आधे शरीर पर राख और भभूत लगाये है.तांडव नृत्य करते है और नंदी भगवान शिव का वाहन है.भगवान शिव की मुद्रा ध्यान मुद्रा है.भगवान शिव को बिल्व पत्र से पूजन करना सबसे अधिक प्रिय है.देव की प्रिया देवी पार्वती है.भगवान शिव के दो पुत्र है.इसमें एक कार्तिकेय और दूसरे भगवान श्री गणेश है.!
बिल्ब पत्र अर्पित करते समय भगवान शिव के 108 नामों का उच्चारण करने से भगवान् भोलेनाथ अतिशीघ्र प्रसन्न होते है.II

–: बिल्वाष्टकम् :–
त्रिदळं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रियायुधम ,
त्रिजन्मपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम.!!१!!
त्रिशाखैः बिल्वपत्रैश्च ह्यच्च्हिद्रैः कोमलैःशुभैः,
शिवपूजां करिश्ह्यामि ह्येकबिल्वं शिवार्पणम !!२!!
अखण्ड बिल्व पत्रेण पूजिते नन्दिकेश्वरे,
शुद्ध्यन्ति सर्वपापेभ्यो ह्येकबिल्वं शिवार्पणम !!३!!
साळग्राम शिलामेकां विप्राणां जातु चार्पयेत,
सोमयञ महापुण्यं ह्येकबिल्वं शिवार्पणम !!४!!
दन्तिकोटि सहस्राणि वाजपेये शतानि च ,
कोटिकन्या महादानं ह्येकबिल्वं शिवार्पणम !!५!!
लश्म्यास्तनुत उत्पन्नं महादेवस्य च प्रियम ,
बिल्ववृशं प्रयच्च्हामि ह्येकबिल्वं शिवार्पणम !!६!!
दर्शनं बिल्ववृशस्य स्पर्शनं पापनाशनम,
अघोरपापसंहारं ह्येकबिल्वं शिवार्पणम !!७!!
मूलतो ब्रह्मरूपाय मध्यतो विश्ह्णुरूपिणे,
अग्रतः शिवरूपाय ह्येकबिल्वं शिवार्पणम!!८!!
बिल्वाश्ह्टकमिदं पुण्यं यः पठेत.ह शिवसन्निधौ .
सर्वपाप विनिर्मुक्तः शिवलोकमवाप्नुयात !!९!!

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